तेरी खुशियां तो जरूर झूमेंगी…

किस से फरियाद करूँ …
किस किस को अब मैं याद करूँ..
खुली आँखों से देखे थे जो सपने ..
बंद कर के उन्हें कैसे अब मैं बर्बाद करूँ .
माजूर हो गया हू इल्ज़ामों के नश्तर से …
कैसे ज़ख़्मों को छिपा पाउँगा पेबंद या अस्तर से..
चिपक गए हैं उम्मीद के कपडे बदन पर मेरे लहू से ..
मैं अकेला ही भिड़ गया हू सपनों के लस्कर से ….

हार मेरे नसीब मे है या जीत कदम चूमेगी….
मौत अगर आ गई तो क्या मेरी कुर्बानी भी गूँजेंगी …
मैंने तो बाँध किया है सबकी खुशिओं का कफ़न…
मैं रहूं अब या न रहूं पर तेरी खुशियां तो जरूर झूमेंगी…..

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……कैसे कमज़ोर कर देता है आप को आप का एक फैसला..

कैसे कमज़ोर कर देता है आप को आप का एक फैसला…
अपनों के लिए लिया हुआ अपनों के लिए जिया हुआ..
अपनों के तानों ज़हर अपनों के लिए पिया हुआ..
अपनों की शिकायतों से तोड़ देता है आप का हौसला …….कैसे कमज़ोर कर देता है आप को आप का एक फैसला..

हर किसी को शायद अपनी तकलीफों का अंदाजा है … गौरतलब ये है कि दर्द उनको मुझ से भी ज़्यादा है …
फिर वो मेरा गम बांटने के लिए मेरी ओर आते है..
रख कर अपनी मैं को हम से आगे, पिला जाते है प्यार से हला ……..कैसे कमज़ोर कर देता है आप को आप का एक फैसला..

मस्सर्रत के लम्हों में वो बे शिकायत थे..
उनकी नज़रों में हम भी बहुत लायक थे..
चंद कुर्बत के पलों ने वो यकीन से डोल गए..
कहते है बेमुर्रवत हो कर , तुम्हारे ही फैसलों से आया है ये ज़लज़ला…कैसे कमज़ोर कर देता है आप को आप का एक फैसला… .

गुनहगार कौन नहीं है तेरी नज़र मे..

बहुत मुमकिन की मैं तेरी सजा का हक़दार हूँ..

बशर्तें बस इतना बता दो की गुनहगार कौन नहीं है तेरी नज़र मे..
मेरे गुनाहों का सामना तो रोज़ करवाते हो मुँह फेर कर …
क्या इतना करम सिर्फ मेरे लिए या है कुछ औरों पर …
मैं तो तेरे कुछ प्यार की बूंदों का प्यासा हू ..
ये बेरुखी का ज़हर क्योँ मला है मेरे होंठों पर ..
कभी भूले से भी तुम मुझे मन में याद करती हो..
यकीं मानों एक सिहरन सी दौड़ जाती है बदन पर …
हर पहर बस एक ही खाब है ज़हन में..
कब पलट कर आओगी और रखोगी अपना सर मेर सीने पर ..

मैं तो हूँ गुनहगार अपने सपनो का … कब देखोगी अपनी नज़र डाल कर मेरी नज़र में…
बशर्तें बस इतना बता दो की गुनहगार कौन नहीं है तेरी नज़र मे

मुझे तो आदत है तेरी बेरुखी की…..

फासलों से अगर मुस्कुराहट लौट आये तुम्हारी….

तो तुम्हें हक़ है कि तुम दूरियाँ बना लो मुझसे…..

गर ये दूरियाँ तुम्हारा सुकून है …..

तुम्हे हक़ है कि दामन छुड़ा लो तुम मुझसे,…..

राह मिल जायेंगे बहुत मेरे जैसे…..

तुम्हे हक़ है नजरें बचा लो तुम मुझेसे…..

मुझे तो आदत है तेरी बेरुखी की…..

तुम्हे हक़ है रस्ते बदल लो तुम मुझसे…..

नहीं हैं मंज़ूर तुम्हे, गर मेरे खाबों में आना तो…..

तुम्हे हक़ है नींदें भी चुरा लो तुम मुझसे…….

Random…

जब भी मैं तुझे रूबरू देखता हूँ ….
तुझ में मुक्कमल ग़ज़ल देखता हूँ..
चमकती हुई महताब सी दुनिया में …
तेरी सादगी में फज़ल देखता हूँ …

आज मेरा प्यार फिर गुनाह हो गया…..

आज मेरा प्यार फिर गुनाह हो गया…… उनके एक इंकार से मैं तो फनाह हो गया….
चाह लेना किसी को ये हमारी चाहत है…
धड़क जाना दिल का देख उन्हें.. ये उसकी आदत है…
पर नहीं मंजूर हुआ उनको मेरे कन्धों पर सर रखना….
हमें तो आज उनसे दो बातें करना भी मना हो गया…
……उनके एक इंकार से मैं तो फनाह हो गया….
इल्ज़ाम ए बेवफाई.. हम पर आज चस्पा है….
हम करेंगे उनकी रुस्वाई ये इलज़ाम हम पर चस्पा है….
शर्म न आये उनको खुद को देख हमारी आँखों में…
बंद कर बैठे रहे आंखें, पहलु में उनके … कि आज चाँद देखना भी मना हो गया..
आज मेरा प्यार फिर गुनाह हो गया…… उनके एक इंकार से मैं तो फनाह हो गया….

मन की चंचलाता

 

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मन की चंचलाता तो देखो .. कैसे कैसे स्वांग रचाये … शादी एक समस्या जैसी बात भी उसको समझ न आये ..

एक तमन्ना हर मन की …. जीवन में हो उसका एक साथी …
कल्पना में रहता वो हर पल .. सपनो में बातें हो जाती …
किशोरावस्था की चंचलता .. यौवन की थी आस जगती …
आशा एक जीवनसाथी की .. मन में एक रोमांच उठती …
रोमांच की गहराइयों में मन ऐसा पगलाए …. शादी एक समस्या जैसी बात भी उसको समझ न आये ..

 

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फिर एक दिन जीवन में वो सूंदर सा पल है आता …
सपनो में देखा था जिसको वो मंडप पर है दर्शाता ..
हर्षित मन स्वयं से , अनेकों प्रश्न पूछ है इठलाता ..
एक बालक सा पुलकित मन .. अपने भाग्य पर है हरसता ..
हर्षाते हर्षाते वो अपना शीश झुकाये .. शादी एक समस्या जैसी बात भी उसको समझ न आये ..

नए जीवनसाथी के संग … भविष्य की पारी में एक नूतन कदम …
संघानी का न लगता मन रसोई में, न साथी का मित्रों के संग ..
कैसे पहुंचे करीब हम उनके .. न डाले कोई रंग में भंग ..
चिर यौवन का आनंद उठायें .. देखें स्वर्मिण स्वप्न एक संग ..
स्वप्नो की मधुरता उसको ,… वर्तमान से है भटकाए .. शादी एक समस्या जैसी बात भी उसको समझ न आये ..

 

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कुछ वर्षों का आनंद .. शेष रहा अब समस्याओं से सम्बंद ..
कभी दवाई ..कभी राशन, इऍमआई से बातें होती आरम्भ …
बच्चों के विद्यालय का शुल्क ..और कामवाली बन गई खुशिओं का स्तम्भ ..
जिस कतूहलता से मचले थे शादी को …नहीं दीख रहा अब उसका अंत ..
अंत की तलाश में , चैन हमारा छिनता जाये … शादी एक समस्या जैसी बात भी उसको समझ न आये ..

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