आज मेरा प्यार फिर गुनाह हो गया…..

आज मेरा प्यार फिर गुनाह हो गया…… उनके एक इंकार से मैं तो फनाह हो गया….
चाह लेना किसी को ये हमारी चाहत है…
धड़क जाना दिल का देख उन्हें.. ये उसकी आदत है…
पर नहीं मंजूर हुआ उनको मेरे कन्धों पर सर रखना….
हमें तो आज उनसे दो बातें करना भी मना हो गया…
……उनके एक इंकार से मैं तो फनाह हो गया….
इल्ज़ाम ए बेवफाई.. हम पर आज चस्पा है….
हम करेंगे उनकी रुस्वाई ये इलज़ाम हम पर चस्पा है….
शर्म न आये उनको खुद को देख हमारी आँखों में…
बंद कर बैठे रहे आंखें, पहलु में उनके … कि आज चाँद देखना भी मना हो गया..
आज मेरा प्यार फिर गुनाह हो गया…… उनके एक इंकार से मैं तो फनाह हो गया….
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मन की चंचलाता

 

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मन की चंचलाता तो देखो .. कैसे कैसे स्वांग रचाये … शादी एक समस्या जैसी बात भी उसको समझ न आये ..

एक तमन्ना हर मन की …. जीवन में हो उसका एक साथी …
कल्पना में रहता वो हर पल .. सपनो में बातें हो जाती …
किशोरावस्था की चंचलता .. यौवन की थी आस जगती …
आशा एक जीवनसाथी की .. मन में एक रोमांच उठती …
रोमांच की गहराइयों में मन ऐसा पगलाए …. शादी एक समस्या जैसी बात भी उसको समझ न आये ..

 

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फिर एक दिन जीवन में वो सूंदर सा पल है आता …
सपनो में देखा था जिसको वो मंडप पर है दर्शाता ..
हर्षित मन स्वयं से , अनेकों प्रश्न पूछ है इठलाता ..
एक बालक सा पुलकित मन .. अपने भाग्य पर है हरसता ..
हर्षाते हर्षाते वो अपना शीश झुकाये .. शादी एक समस्या जैसी बात भी उसको समझ न आये ..

नए जीवनसाथी के संग … भविष्य की पारी में एक नूतन कदम …
संघानी का न लगता मन रसोई में, न साथी का मित्रों के संग ..
कैसे पहुंचे करीब हम उनके .. न डाले कोई रंग में भंग ..
चिर यौवन का आनंद उठायें .. देखें स्वर्मिण स्वप्न एक संग ..
स्वप्नो की मधुरता उसको ,… वर्तमान से है भटकाए .. शादी एक समस्या जैसी बात भी उसको समझ न आये ..

 

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कुछ वर्षों का आनंद .. शेष रहा अब समस्याओं से सम्बंद ..
कभी दवाई ..कभी राशन, इऍमआई से बातें होती आरम्भ …
बच्चों के विद्यालय का शुल्क ..और कामवाली बन गई खुशिओं का स्तम्भ ..
जिस कतूहलता से मचले थे शादी को …नहीं दीख रहा अब उसका अंत ..
अंत की तलाश में , चैन हमारा छिनता जाये … शादी एक समस्या जैसी बात भी उसको समझ न आये ..

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सांस तो है पर हरकत रुक सी गई है….

 

क्या मेरी जिंदगी अब थम सी गई है….. सांस तो है पर हरकत रुक सी गई है….

कुछ भी कर गुजरने का हौसला था मन में कभी…

झुकना न सीखा था किसी के आगे इस तन ने कभी…

हौसला था  कि बदल दूंगा गर हालत होंगे मुश्किंल ….

खुद की बदली हुई तस्वीर देख आँख आज झुक सी गई है ……सांस तो है पर हरकत रुक सी गई है….

 

बचपन बीता माँ की गोद में और आँखों में थी मस्ती….

जवानी आते ही  भवर में फास गई हमारी कश्ती ….

न अब माँ का ही सहारा है हम और न है हमारी हस्ती…

दर्द ऐ अहसास इसकदर जैसे पुरानी चोट दुःख सी गई है…… सांस तो है पर हरकत रुक सी गई है….

 

क्या करूँ, कैसे करूँ और करूँ तो पहले किसके लिए करूँ ……..

कुछ पल खुद के लिए जियूं या ज़माने के लिए तिल तिल मरुँ ……

शतरंज की इस बिसात पर अब आगे कौन कौन मुझे घेरेगा…

जीतने की आदत थी जिसे , लगता है अब उसकी मात हो ही गई है ……..सांस तो है पर हरकत रुक सी गई है….

क्या मेरी जिंदगी अब थम सी गई है….. सांस तो है पर हरकत रुक सी गई है….

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क्या मैं वही इंसान हूँ…

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इस जहाँ का सबसे हसीं निर्माण हूँ …. क्या मैं वही इंसान हूँ…

संसार के जानवरों में बेहतर बनने की होड़ हुई…

आगे बढ़ने की स्पर्धा में सारी जोड़ तोड़ हुई …

सबने सारा ज़ोर लगा कर कुछ न कुछ जीत लिया …

मैंने देखा सबको लड़ते पर परिणाम से हैरान हूँ…       क्या मैं वही इंसान हूँ…

 

जिस चीज़ का मोल वो सारे मिल कर न समझ सके …

मैंने उसे उठा लिया कि कोई न मुझको देख सके ..

बुद्धि विवेक कि वो पोटली मैं चुपके संग ले आया..

अपने अंदर समां के उसको, लगा बस मैं ही बुद्धिमान हूँ …क्या मैं वही इंसान हूँ…

 

जीवन शैली को सुधारा, हर दिन एक अविष्कार किया…

खुद को श्रेष्ठ साबित कर बुद्धजीवी का नाम दिया …i

आगे बढ़ने और सवारने में जाने मैंने क्या ये कर डाला…

जिस प्रकृति से वरदान लिया  उसपर एक श्राप सामान हूँ…क्या मैं वही इंसान हूँ…

 

मानव बन मानवता से मैंने हर पल दुराचार किया…

अहंकार में चूर निरबल और अबला पर वार किया..

युद्ध, अतिक्रमड़ और बलात्कार को कैसे मैंने अपनाया ..

पशुता में अब मैं , सारे पशुओं का भी भगवन हूँ …. .क्या मैं वही इंसान हूँ…

इस जहाँ का सबसे हसीं निर्माण हूँ …. क्या मैं वही इंसान हूँ…

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This is where I am creating the most … am I the same person …?

There was a competition to become better in the world’s animals …

All the manipulative breaks in the competition …

Everyone wins nothing by winning anything …

I saw everyone fight but I am surprised by the result … am I the same person?

 

Do not understand the value of the things that they can find …

I picked it up that no one could see me ..

Bottle of that wisdom I bring with me in secret.

After pouring in inside myself, thought I am only intelligent..   am I the same person?

 

Improve lifestyle, invented every day …

Prove himself as the best, and given the name of intellectual…

Did I do this by moving forward and moving …

The nature who given everything, now I am curse on it….    am I the same person?

 

Human beings have done mischief every moment of humanity …

In the ego stabbed Shared and women.

How did I adopt war, aggression and rape?

Now in the animal kingdom, I am God of all animals ….   am I the same person?

 

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साथ का अहसास बहुत है ……

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तेरा साथ नहीं हैं तो क्या. साथ का अहसास बहुत है ……

समेट रखी है तेरी हर बात जहन में….
देती है जो जीने का हौसला इस सफर में….
धड़क जाता है दिल तेरी याद के एक झोके से…
नहीं तो फनाह होने के यहाँ सामान बहुत है ………तेरा साथ नहीं हैं तो क्या साथ का अहसास बहुत है …..

शायद हैं मेरे पास आज तेरे हर उस सवाल का जवाब …
कभी दागे थे तूने, और किया था मेरी हौसलों का हिसाब….
अक्सर तन्हाई में जब ये मन तेरे लिए मचल जाता है…
उसको समझाने के लिए तेरे पूछे वो सवाल बहुत है…. ..तेरा साथ नहीं हैं तो क्या साथ का अहसास बहुत है …..

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ना गवार रही दुनिया को हमेशा हमारी करीबी…
किसी ने मेरी हैसियत दिखाई तो किसी ने गरीबी…
डुबाने के लिए मेरी हस्ती ज़माने ने ढूंढे समंदर ..
रकीबों को क्या पता मेरे लिए तेरे दो अश्क बहुत है…. तेरा साथ नहीं हैं तो क्या साथ का अहसास बहुत है …..

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मेरा देश ..

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मेरा देश ..

 सब  ने  पूछा  मुझेसे  एक  दिन  … सबसे  प्यारा  क्या  परिवेश  …

मेरे  मन  में  एकाकी  उत्तर ..मेरा  देश  बस मेरा  देश

जिस धरा  पर  जनम  लिया, क्योँ    उसका  मान  बढ़ाऊं 

एक  नहीं  हज़ारों  बार  इसकी  रक्षा  में   अपने  प्राण  गावउँ

भूले  से  भी    कोई  उठा  सके  नज़रें  मैली   करके  इसकी  ओर ..

शीश  अलग  कर दूँ  मैं  उसका    रहे  उसका  कोई  अवशेषः ..

सब  ने  पूछा  मुझेसे  एक  दिन  … सबसे  प्यारा  क्या  परिवेश  …

मेरे  मन  में  एकाकी  उत्तर ..मेरा  देश  बस मेरा  देश

डरते नहीं  हम   बाहरी  दुश्मन  से ..कुछ  छिपे  हुए  हैं  जयचंद. .

छीन  रहे  हमारी  समरसता  जुटा  रहे हैं उसके लिए धन ..

अफसोस  है  मुझे  अपनों  पर  नहीं  हो  रहे  अब  भी   एक .. 

इन  सब  गद्दारों  को  कुचलें  धारण  करो   परशुराम  का  भेष ….

सब  ने  पूछा  मुझेसे  एक  दिन  … सबसे  प्यारा  क्या  परिवेश  …

मेरे  मन  में  एकाकी  उत्तर ..मेरा  देश  बस मेरा  देश

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 हिन्द की  इस  जमीन  को  हम  खंड  खंड  कर  रहे  …. 

हर  रोज़  हम एक  दुसरे से  बिना सोचे  समझे  ही लड़  रहे ..

कहीं  नक्सल , कहीं  नागाबोडो .. और  इस्लाम   के  नारे  चल  रहे ..

ऐसे  ही लड़ते  रहोगे  तो  भविष्य में होंगे बस हमारे  अवशेष  …

सब  ने  पूछा  मुझेसे  एक  दिन  … सबसे  प्यारा  क्या  परिवेश  …

मेरे  मन  में  एकाकी  उत्तर ..मेरा  देश  बस मेरा  देश

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मेरी लाडो………..

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मेरी लाडो… ……..

सब कर रहे बेटा बेटा … जैसे पी हो भंग ..
सब बेटे हो जायेंगे तो बेटे ब्याहोगे किसके संग …
बेटे ब्याहोगे किसके संग ..ये बात तो बूझो …
नहीं आये समझ में तो अपने आप से पूछो …
है कृपा भगवन की श्रीकृति आ गई हमारे अंक ..
अतिशय जैसा सुन्दर बेटा बेटी हमारी दबंग …
बेटी हमारी दबंग .. करे बहुत शैतानी …,
देखन में सीधी लगे पर वो है शैतान की नानी..
प्रथम जन्मदिवस पर उसको यही है शुभाशीष ..
अपनी माँ की छवि बने न झुके हमारा शीश
कह रहे श्रीकृति के पापा सुनलो सरे मित्र…..
बेटी को स्वीकारो अन्यथा शेष रहेंगे चित्र….

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